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Showing posts from March, 2023

Shiv mantra

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                 Shiv mantra  1. इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्। वन्दे महोदारतरं स्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥ 2. ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिंगम् निर्मलभासितशोभितलिंगम्। जन्मजदु:खविनाशकलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्॥ 3. देवमुनिप्रवरार्चितलिंगम् कामदहं करुणाकरलिंगम्। रावणदर्पविनाशनलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्॥ 4. सर्वसुगन्धिसुलेपितलिंगम् बुद्धिविवर्द्धनकारणलिंगम् । सिद्धसुरासुरवन्दितलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥ 5. कनकमहामणिभूषितलिंगम्फ णिपतिवेष्टितशोभितलिंगम्। दक्षसुयज्ञविनाशनलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥ 6. कुंकुमचन्दनलेपितलिंगम् पंकजहारसुशोभितलिंगम्। संचितपापविनाशनलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥ 7. देवगणार्चितसेवितलिंगम् भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्। दिनकरकोटिप्रभाकरलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥ 8. अष्टदलोपरिवेष्टितलिंगम् सर्वसमुद्भवकारणलिंगम्। अष्टदरिद्रविनाशितलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम्॥ 9. सुरगुरुसुरवरपूजितलिंगम् सुरवनपुष्पसदार्चितलिंगम्। परात्परं परमात्मकलिंगम् तत्प्रणमामि सदाशिवलिंगम...

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1

                        श्रीमद्भगवद्गीता                       अथ प्रथमोऽध्यायः                                           धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥  अर्थ :- धृतराष्ट्र बोले—हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें एकत्रित, युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया ? ॥१॥ English meaning :- Dhritarashtra said, “When my troops and the sons of Pandu, eager to fight, were arrayed on the Kuru field, the field of law,what did they do, Sanjaya?”                           सञ्जय उवाच दृष्ट्वा  तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।  आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ अर्थ :- संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधनने व्य...

गणेश मंत्र एवं स्तोत्र।

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       गणेश मंत्र एवं स्तोत्र। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले श्री गणेश का आह्वान किया जाता है।भगवान श्री गणेश सभी तरह के विघ्न हरने वाले देवता हैं।भगवान गणेश के मंत्रों का जाप करना अतिशुभ माना जाता है।श्री गणेश की कृपा पाने के लिए उनके मंत्रों का जाप हमें नियमित रूप से करना चाहिए।उनके इन शुभ मंत्रों का जाप करने से जीवन की हर समस्या का समाधान पाया जा सकता है। यहां पढ़ें गणपति जी के मंत्र- धूम्रकेतुर्गनाध्याक्षो भालचन्द्र गजानन:। द्वादाष्टनि नामानि य: पाठच्छानुयादपि ।। विद्यारम्भे विवाहैच् प्रवेश निर्गमा तथा। संग्रामे संकेते चैव विघ्नस्तस्य नं जयते ।। अर्थ :- श्री गणपति के ये बारह नाम कल्याणकारी हैं। इसलिए विद्याध्ययन के प्रारंभ में, शुभ विवाह के अवसर पर, महापुरुषों से मिलने जाने के अवसर पर, तीर्थयात्रा के अवसर पर, युद्ध के आरंभ में, जब कोई विपत्ति आती है, तब ये बगजानन के बारह शुभ नाम का पाठ अवश्य करना चाहिए, ताकि कोई विघ्न न आए और कार्य सिद्ध हो। सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्ण, लंबोदर, विकट, विघ्नश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन...

श्रीकृष्णाष्टकम्

श्रीकृष्णाष्टकम् भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनङ्गरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम् ।।१।। अर्थ :- मैं व्रजभूमि के एकमात्र आभूषण, सभी पापों का नाश करने वाले, अपने भक्तों के मन को सुशोभित करने वाले नंदानंद का हमेशा जप करता हूं। जिनके मस्तक पर सुन्दर नन्दनन्दन का मुकुट सुशोभित है, जिनके हाथों में मधुर बाँसुरी है, तथा जो प्रेम तरंगों के सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ । मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ।।२।। अर्थ :- कामदेव के अभिमान को हरने वाले, बड़े-बड़े सुन्दर नेत्रों वाले, व्रजगोपियों के शोक को हरने वाले भगवान कमलनायन को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने अपने हस्तकमल के उपर गिरिराज को धारण किया है, जिनकी मुस्कान और स्मृति अत्यंत सुंदर है, जिन्होंने पराक्रम में श्रेष्ठ देवराज इन्द्र के अभिमान का खंडन किया है, उन श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ। कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमाम...

वेदसारशिवस्तवः

वेदसारशिवस्तवः पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं  वरेण्यम्। जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ।।१।। अर्थ :- जो सम्पूर्ण प्राणियों के रक्षक हैं, पाप का ध्वंस करनेवाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराज का चर्मपहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूट में श्रीगंगा जी खेल रहीं हैं उन एकमात्र कामारि श्रीमहादेवजी का मैं स्मरण करता हूँ । महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्। विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।।२।। अर्थ :- जे महेश्वर, देवताओं का ईश, देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले, सर्वव्यापी, संसार के स्वामी, शरीर पर विभूति रूप धारण करने वाले, विरूपनयन, सूर्य, चंद्र और अग्निरूपी तीन नेत्र वाले और सदा आनंदमय हैं। मैं उन पंचमुखी भगवान शंकर की स्तुति करता हूँ। गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्। भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।।३।। अर्थ :- पर्वतों के स्वामी,गण के स्वामी,नीलकंठ, वृषभाना, त्रिगुणतीतस्वरूपा,संसार की उत्पत्ति, दीप्तिमान, भस्म से सुशोभित अ...

गायत्री मन्त्र

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गायत्री मन्त्र गायत्री मंत्र अन्य कई मंत्रों से ज्यादा प्रभावशाली माना गया है। शास्त्रों में भी इस मंत्र में को बहुत शक्तिशाली बताया गया है। इस मंत्र का जाप करने के लिए किसी विशेष समय की आवश्यकता नहीं होती है। फिर भी इस मंत्र का जाप एक समय और नियम के अनुसार किया जाए तो यह एक ऐसा मंत्र है जिसमें हर समस्या का निदान छुपा हुआ है। इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, के साथ जीवन में खुशियों का संचार होता है। यह अत्याधिक लाभकारी मंत्र है।                  ॐ एकदन्ताय विद्महे                वक्रतुण्डाय धीमहि               तन्नो दान्तिः प्रचोदयात्  ।।               ॐ तत्पुरुषाय विद्महे                महादेवाय धीमहि                तन्नो रुद्रः प्रोद्यत ।।                 ॐ नारायणाय विद्महे     ...

श्री गणपति के 108 नाम के मंत्र

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  श्री गणपति के 108 नाम अर्थ सहित भगवान शिव ने गणेश जी को ये आशीर्वाद दिया था कि जब भी कोई पूजा होगी, तो सबसे पहले गणेश जी का ही स्मरण होगा, इसीलिए पूजा में सबसे पहले गणेश जी का ही स्मरण किया जाता है। गणेश जी के 108 नामों का जाप करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भगवान गणेश के नाम का स्मरण मात्र करने से भी भक्तों के सारे संकट और संकट दूर हो जाते हैं। 1. बालगणपति : सबसे प्रिय बालक 2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो 3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान 4. धूम्रवर्ण : धुंए को उड़ाने वाला 5. एकाक्षर : एकल अक्षर 6. एकदन्त : एक दांत वाले 7. गजकर्ण : हाथी की तरह आंखें वाला 8. गजानन : हाथी के मुख वाले भगवान 9. गजनान : हाथी के मुख वाले भगवान 10. गजवक्र : हाथी की सूंड वाला 11. गजवक्त्र : जिसका हाथी की तरह मुँह है 12. गणाध्यक्ष : सभी गणों के मालिक 13. गणपति : सभी गणों के मालिक 14. गौरीसुत: माता गौरी के पुत्र 15. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले 16. लम्बोदर : बड़े पेट वाले 17. महाबल : बलशाली 18. महागणपति : देवो के देव 19. महेश्वर : ब्रह्मांड के भगवान 20. मंगलमूर्त्ति : शुभ कार्य के देव 21. मूषकवाहन...

Shiv mantra

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  हिंदू संस्कृति में कल्याणकारी सदाशिव का स्थान सभी देवताओं में सर्वोपरि है। भारत ही नहीं, अपितु समस्त विश्व में शिव की आराधना किसी न किसी रूप में की जाती है। सर्वाधिक प्राचीन देवों में भगवान आशुतोष शिव को इस सृष्टि का नियन्ता, पालनकर्ता और संहारक माना गया है। उन्हीं की इच्छा से इस सृष्टि का आविर्भाव होता है और उन्हीं की इच्छा से इसका विनाश होता है। Shiv mantra-            1.   नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय ॥ 2. मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय। मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नम: शिवाय ॥ 3. शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नम: शिवाय ॥ 4. वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नम: शिवायः ॥ 5. यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नम: शिवाय् ॥ 6. ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान...

यह हैं सुबह के 10 मंत्र, कोई 1 भी पढ़ लिया तो मिलेगी हर कार्य में सफलता

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  यह हैं सुबह के 10 मंत्र , कोई 1 भी पढ़ लिया तो मिलेगी हर कार्य में सफलता Mantra Benefits : सनातन हिंदू धर्म में मंत्रोच्चारण की परंपरा सदियों से चली आ रही है. पूजा-पाठ, यज्ञ और हवन से लेकर सभी धार्मिक अनुष्ठानों में मंत्रों का विशेष महत्व होता है. मंत्रों के जाप से न केवल देवी-देवता प्रसन्न होते हैं बल्कि इससे नकारात्मकता भी दूर होती है. ज्योतिष में तनावमुक्त जीवन और परेशानियों से मुक्ति के लिए भी मंत्रों को कारगर माना गया है. अगर आप चाहते हैं हर दिन आपका शुभ और सफलतादायक हो तो बिस्तर से उठते ही अपने दोनों हाथों को आपस में रगड़ कर चेहरे पर लगाएं और दिए गए 10 मंत्रों में से किसी भी 1 मंत्र को बोलें। आपका दिन उन्नतिदायक और प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत होगा।  1 . ॐ मंगलम् भगवान विष्णु: मंगलम् गरूड़ध्वज:। मंगलम् पुण्डरीकांक्ष: मंगलाय तनो हरि।।   2 . कराग्रे वसते लक्ष्मी: कर मध्ये सरस्वती। करमूले गोविन्दाय, प्रभाते कर दर्शनम्। 3 . गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:   4 . करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयन...

Shiv stuti

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शिव स्तुति श्री गिरिजापति वंदिकर, चरण मध्य शिरनाय । कहत अयोध्यादास तुम, मो पर होहु सहाय ।। मैं अयोध्यादास माता पार्वती के पति भगवान शंकर की वंदना करता हूं व उनके चरणों में शीश नवाकर प्रार्थना करता हूं कि वे मेरी सहायता करें। नंदी की सवारी, नाग अंगीकार धारी,  नित संत सुखकारी, नीलकंठ त्रिपुरारी हैं। गले मुण्डमाला धारी, सिर सोहे जटाधारी, वाम अंग में बिहारी, गिरिजा सुतवारी हैं ।। नंदी जिनका वाहन है, नागों को जिन्होंने अपने अंगों पर धारण किया हुआ है, जो नित्यप्रति संतजनों को सुख प्रदान करने वाले हैं; ऐसे नीलकंठ भगवान शंकर जी हैं। उन्हें हमारा प्रणाम स्वीकार हो। जिनके गले में मुंडों की माला है, जो सिर पर जटा धारण किए हुए हैं; वाम अंग में पार्वती जी विराजमान हैं, ऐसे पर्वतों के राजा भगवान शंकर जी हैं। दानी देख भारी, शेष शारदा पुकारी,  काशीपति मदनारी, कर त्रिशूल चक्रधारी हैं। कला उजियारी, लख देव सो निहारी,  यश गावें वेद चारी, सो हमारी रखवारी हैं ।। शारदा और शेष द्वारा महादानी के रूप में स्तुत्य, काम- शत्रु काशीपति शिव हाथ में त्रिशूल और चक्र धारण किए हुए हैं। जिनकी उज्ज्वल कला को...

भगवान शंकर के पूर्ण काल ​​भैरव रूप

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भगवान शंकर के पूर्ण काल ​​भैरव रूप एक बार सुमेरु पर्वत पर बैठे हुए ब्रम्हाजी के पास जाकर देवताओं ने उनसे अविनाशी तत्व बताने का अनुरोध किया | शिवजी की माया से मोहित ब्रह्माजी उस तत्व को न जानते हुए भी इस प्रकार कहने लगे - मैं ही इस संसार को उत्पन्न करने वाला स्वयंभू, अजन्मा, एक मात्र ईश्वर , अनादी भक्ति, ब्रह्म घोर निरंजन आत्मा हूँ|   मैं ही प्रवृति उर निवृति का मूलाधार , सर्वलीन पूर्ण ब्रह्म हूँ | ब्रह्मा जी ऐसा की पर मुनि मंडली में विद्यमान विष्णु जी ने उन्हें समझाते हुए कहा की मेरी आज्ञा से तो तुम सृष्टी के रचियता बने हो, मेरा अनादर करके तुम अपने प्रभुत्व की बात कैसे कर रहे हो ?  इस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित करने लगे और अपने पक्ष के समर्थन में शास्त्र वाक्य उद्घृत करने लगे| अंततः वेदों से पूछने का निर्णय हुआ तो स्वरुप धारण करके आये चारों वेदों ने क्रमशः अपना मत६ इस प्रकार प्रकट किया -  ऋग्वेद- जिसके भीतर समस्त भूत निहित हैं तथा जिससे सब कुछ प्रवत्त होता है और जिसे परमात्व कहा जाता है, वह एक रूद्र रूप ही है |  यजुर्वेद- जिसके द्वा...

श्री गणेश चतुर्थी की कथा

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श्री गणेश चतुर्थी की कथा एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद पार्वती ने स्नान करते समय अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसे सतीव कर दिया। उसका नाम उन्होंने गणेश रखा। पार्वती जी ने गणेश जी से कहा- 'हे पुत्र ! तुम एक मुद्गर लेकर द्वार पर जाकर पहरा दो। मैं भीतर स्नान कर रही हूं। इसलिए यह ध्यान रखना कि जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी को भीतर मत आने देना। उधर थोड़ी देर बाद भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव जी वापस आए और घर के अंदर प्रवेश करना चाहा तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उसका सिर, धड़ से अलग करके अंदर चले गए। टेढ़ी भृकुटि वाले शिवजी जब अंदर पहुंचे तो पार्वती जी ने उन्हें नाराज़ देखकर समझा कि भोजन में विलम्ब के कारण महादेव नाराज़ हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया और भोजन करने का निवेदन किया। तब दूसरी थाली देखकर शिवजी ने पार्वती से पूछा- 'यह दूसरी थाली किस के लिए लगाई है?' इस पर पार्वती जी बोली- ' अपने...